परिग्रह के त्याग में ही शांति का अनुभव - मुनिश्री शैल सागरजी


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गुना। (प्रदेश केसरी) संसार में तो सभी व्यक्ति दुखी है, लेकिन अपने दुख से कम दुखी पर पड़ोसी के सुख से ज्यादा दु:खी है। अगर सुख प्राप्त करना है तो  आपको मुनि पद प्राप्त करना है क्योंकि बिना मुनि पद प्राप्त किए मोक्ष संभव नहीं है। जब तक मनुष्य का परिग्रह का त्याग नहीं होगा तब तक मुनि पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता। जिसको आगे बढऩा है वह सबसे पहले परिग्रह का त्याग करना होगा। परिग्रह भी दो प्रकार के होते हैं अतरंग परिग्रह और बहरंग परिग्रह। पहले आपको बाहर का परिग्रह छोडऩा पड़ेगा फिर अंदर का छुडेगा। परिग्रह छोडऩे का अहसास कर्ज से मुक्ति जैसा है। बड़ी शांति का अनुभव होगा, मानो सिर का भार उतर गया हो। उक्त धर्मोपदेश आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री शैल सागरजी महाराज ने चौधरी मोहल्ला स्थित पाश्र्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि जिस तरह कुंए में भरे पानी को आप निकलोगे तो नहीं वह बढ़ेगा भी नहीं और न ही साफ होगा। उसी तरह हम जो परिग्रह इकट्ठा करते जाते हैं उसका यदि सदुपयोग नहीं करते हैं तो अंत में सड़ ही जाता है। धन की तीन ही गतियां है दान, भोग नहीं तो फिर नाश तो होना ही है। यदि नाश ही होना है तो क्यों न हम उसका सदुपयोग करें। मुनिश्री ने कहा कि हमें शांति का अनुभव करना है और अपने आपको पहचान है तो सबसे पहले हमें बहरंग परिग्रह को छोडऩा होगा।

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