जीवन में शांति चाहते हो तो दूसरे के जीवन में कभी अशांति का कारण मत बनना - मुनिश्री निकलंक सागरजी

चौधरी मोहल्ला स्थित महावीर परिसर में हुई धर्मसभा




CLICK -

गुना। (प्रदेश केसरी) क्रोध, मान और माया का समन (नाश) करना ही शांति है। अपने जीवन में शांति चाहते हो तो हमें कोशिश करनी होगी कि हम किसी दूसरे के जीवन में अशांति का कारण न बनें। दुनिया के सभी प्राणी मात्र का अच्छा सोचो। यदि तुम दूसरे के लिए सुख की सोच रखोंगे तो तुम भी सुख होगी। दूसरे की कल्याण की भावना में ही अपना कल्याण है। जीवन में कभी लोभ नहीं करना चाहिए। लोभ को पाप का बाप कहा गया है। लोभी व्यक्ति जिंदगीभर जोड़ता रहता है लेकिन धन का सदुपयोग नहीं करता। जबकि कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके पास कुछ नहीं होता है लेकिन उनके जीवन जीने का तरीका अच्छा होता है। इसलिए जीवन में लोभ की वृत्ति को कम करो। उक्त धर्मोपदेश आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री निकलंक सागरजी महाराज ने चौधरी मोहल्ला स्थित महावीर भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। इस अवसर पर मुनिश्री प्रसाद सागरजी महाराज भी मंच पर विराजमान थे। इसके पूर्व मंगलाचारण के साथ आचार्यश्री की पूजन हुई। धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री निकलंक सागरजी महाराज ने कहा कि हमेशा देव, शास्त्र और गुरु के प्रति विनय रखे। धर्मसभा में गुरु के आने के पहले आकर बैठना चाहिए।  गांवों में जब साधु संत जाते हैं तो वहां लोग गुरु उपदेशों को तरसते हैं। आप लोगों के भाग्य अच्छे हैं तो साधु समागम का सद्उपयोग करो। मुनिश्री ने कहा कि जब जीवन में सुख आएं तो समताभाव धारण करना चाहिए। जब दु:ख के दिन आएं तो निराश नहीं होना चाहिए। दु:ख के दिनों को शांति से जियो। यदि दुख के दिनों को दु:खी होकर जियोगे तो असाता वेदनीय कर्म का बंध होगा। दु:ख के दिनों में समता भाव रखकर भगवान की भक्ति करोगे तो निश्चित ही सुख के दिन आएंगे। 

Post a Comment

0 Comments